(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्रमवासिकपर्व - अध्याय 041


॥ श्रीः ॥
16.14. अध्यायः 014
अथाश्रमवासपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - AshramaVasika Parva - Chapter Topics
विदुरेण धृतराष्ट्रंप्रति युधिष्ठिरेण भीष्मादीनां श्राद्धदानाय धनदानाङ्गीकरणनिवेदनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - AshramaVasika Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच।

एवमुक्तस्तु राज्ञा स विदुरो बुद्धिसत्तमः।
धृतराष्ट्रमुपेत्यैव वाक्यमाह महार्थवत्॥ 16-14-1(97605)
उक्तो युधिष्ठिरो राजा भवद्वचनमादितः।
स च संश्रुत्य वाक्यं ते प्रशशंस महाद्युतिः॥ 16-14-2(97606)
बीभत्सुश्च महातेजा निवेदयति ते गृहान्।
वसु तस्य गृहे यच्च प्राणानपि च केवलान्॥ 16-14-3(97607)
धर्मराजश्च पुत्रस्ते राज्यं प्राणान्धनानि च।
अनुजानाति राजर्षे यच्चान्यदपि किञ्चन॥ 16-14-4(97608)
भीमस्तु सर्वदुःखानि संस्मृत्य बहुलान्युत।
कृच्छ्रादिव महाबाहुरनुजज्ञे विनिःश्वसन्॥ 16-14-5(97609)
र राजन्धर्मशीलेन राज्ञा बीभत्सुना तथा।
अनुनीतो महाबाहुः सौहृदे स्थापितोपि च॥ 16-14-6(97610)
न च मन्युस्त्वया कार्य इति त्वां प्राह धर्मराट्।
संस्मृत्य भीमस्तद्वैरं यदन्यायवदाचरत्॥ 16-14-7(97611)
एवंप्रायो हि धर्मोऽयं क्षत्रियाणां नराधिप।
शुद्धे क्षत्रियधर्मे न निरतोऽयं वृकोदरः॥ 16-14-8(97612)
वृकोदरकृते चाहमर्जुनश्च पुनः पुनः।
प्रसीद याचे नृपते भवान्प्रभुरिहास्ति यत्॥ 16-14-9(97613)
तद्ददातु भवान्वित्तं यावदिच्छसि पार्थिवः।
त्वमीश्वरो नो राज्यस्य प्राणानामपि भारत॥ 16-14-10(97614)
ब्रह्मदेयाग्रहारांश्च पुत्राणामौर्ध्वदेहिकम्।
इतो रत्नानि गाश्चैव दासीदासमजाविकम्॥ 16-14-11(97615)
अर्चयित्वा कुरुश्रेष्ठो ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छतु।
दीनान्धकृपणेभ्यश्च तत्रतत्र नृपाज्ञया॥ 16-14-12(97616)
बह्वन्नरसपानाढ्याः सभा विदुर कारय।
गवां निपानान्यन्यच्च विविधं पुण्यकं कुरु॥ 16-14-13(97617)
इति मामब्रवीद्राजा पार्थश्चैव धनंजयः।
यदत्रानन्तरं कार्यं तद्भवम्ववक्तुमर्हति॥ 16-14-14(97618)
इत्युक्ते विदुरेणाथ धृतराष्ट्रोऽभिनन्द्य तान्।
मनश्चक्रे महादाने कार्तिक्यां जनमेजय॥ 16-14-15(97619)

॥ इती श्रीमन्महाभारते आश्रमवासिकपर्वणि आश्रमवासपर्वणि चतुर्दशोऽध्यायः॥ 14 ॥


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